श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.25

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सन्दधेऽस्त्रं स्वधनुषि कामः पंचमुखं तदा।

मधुर्मनो रजस्तोक इन्द्रभृत्या व्यकम्पयन्॥ २५

sandadhe'straṃ svadhanuṣi kāmaḥ paṃcamukhaṃ tadā|

madhurmano rajastoka indrabhṛtyā vyakampayan|| 25

अर्थ

शौनकजी! अब कामदेवने अपने पुष्पनिर्मित धनुषपर पंचमुख बाण चढ़ाया। उसके बाणके पाँच मुख हैं—शोषण, दीपन, सम्मोहन, तापन और उन्मादन। जिस समय वह निशाना लगानेकी ताकमें था, उस समय इन्द्रके सेवक वसन्त और लोभ मार्कण्डेयमुनिका मन विचलित करनेके लिये प्रयत्‍नशील थे॥ २५॥

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