उस समय मार्कण्डेय मुनि अग्निहोत्र करके भगवान्की उपासना कर रहे थे। उनके नेत्र बंद थे। वे इतने तेजस्वी थे, मानो स्वयं अग्निदेव ही मूर्तिमान् होकर बैठे हों! उनको देखनेसे ही मालूम हो जाता था कि इनको पराजित कर सकना बहुत ही कठिन है। इन्द्रके आज्ञाकारी सेवकोंने मार्कण्डेय मुनिको इसी अवस्थामें देखा॥ २३॥
हुत्वाग्निं समुपासीनं ददृशुः शक्रकिंकराः।
मीलिताक्षं दुराधर्षं मूर्तिमन्तमिवानलम्॥ २३
उस समय मार्कण्डेय मुनि अग्निहोत्र करके भगवान्की उपासना कर रहे थे। उनके नेत्र बंद थे। वे इतने तेजस्वी थे, मानो स्वयं अग्निदेव ही मूर्तिमान् होकर बैठे हों! उनको देखनेसे ही मालूम हो जाता था कि इनको पराजित कर सकना बहुत ही कठिन है। इन्द्रके आज्ञाकारी सेवकोंने मार्कण्डेय मुनिको इसी अवस्थामें देखा॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 948) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/8/23/