आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रतधारी एवं योगी मार्कण्डेयजी इस प्रकार तपस्या, स्वाध्याय और संयम आदिके द्वारा अविद्या आदि सारे क्लेशोंको मिटाकर शुद्ध अन्तःकरणसे इन्द्रियातीत परमात्माका ध्यान करने लगे॥ १३॥
इत्थं बृहद्व्रतधरस्तपस्स्वाध्यायसंयमैः।
दध्यावधोक्षजं योगी ध्वस्तक्लेशान्तरात्मना॥ १३
आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रतधारी एवं योगी मार्कण्डेयजी इस प्रकार तपस्या, स्वाध्याय और संयम आदिके द्वारा अविद्या आदि सारे क्लेशोंको मिटाकर शुद्ध अन्तःकरणसे इन्द्रियातीत परमात्माका ध्यान करने लगे॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.8.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 947) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/8/13/