॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.7.5
त्रय्यारुणिः कश्यपश्च सावर्णिरकृतव्रणः।
वैशम्पायन हारीतौ षड् वै पौराणिका इमे॥ ५
trayyāruṇiḥ kaśyapaśca sāvarṇirakṛtavraṇaḥ|
vaiśampāyana hārītau ṣaḍ vai paurāṇikā ime|| 5
अर्थ
शौनकजी! पुराणोंके छः आचार्य प्रसिद्ध हैं—त्रय्यारुणि, कश्यप, सावर्णि, अकृतव्रण, वैशम्पायन और हारीत॥ ५॥ इन लोगोंने मेरे पिताजीसे एक-एक पुराणसंहिता पढ़ी थी और मेरे पिताजीने स्वयं भगवान् व्याससे उन संहिताओंका अध्ययन किया था। मैंने उन छहों आचार्योंसे सभी संहिताओंका अध्ययन किया था॥ ६॥ उन छः संहिताओंके अतिरिक्त और भी चार मूल संहिताएँ थीं। उन्हें भी कश्यप, सावर्णि, परशुरामजीके शिष्य अकृतव्रण और उन सबके साथ मैंने व्यासजीके शिष्य श्रीरोमहर्षणजीसे, जो मेरे पिता थे, अध्ययन किया था॥ ७॥