श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.7.3

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

कुमुदः शुनको ब्रह्मन् जाजलिश्‍चाप्यथर्ववित्।

बभ्रुः शिष्योऽथांगिरसः सैन्धवायन एव च।

अधीयेतां संहिते द्वे सावर्ण्याद्यास्तथापरे॥ ३

kumudaḥ śunako brahman jājaliścāpyatharvavit|

babhruḥ śiṣyo'thāṃgirasaḥ saindhavāyana eva ca|

adhīyetāṃ saṃhite dve sāvarṇyādyāstathāpare|| 3

अर्थ

शौनकजी! पथ्यके तीन शिष्य थे—कुमुद, शुनक और अथर्ववेत्ता जाजलि। अंगिरा-गोत्रोत्पन्‍न शुनकके दो शिष्य थे—बभ्रु और सैन्धवायन। उन लोगोंने दो संहिताओंका अध्ययन किया। अथर्ववेदके आचार्योंमें इनके अतिरिक्त सैन्धवायनादिके शिष्य सावर्ण्य आदि तथा नक्षत्रकल्प, शान्ति, कश्यप, आंगिरस आदि कई विद्वान् और भी हुए। अब मैं तुम्हें पौराणिकोंके सम्बन्धमें सुनाता हूँ॥ ३-४॥

यह अर्थ श्लोक 3–4 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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