ya iha vāva sthiracaranikarāṇāṃ nijaniketanānāṃ manaïndriyāsugaṇānanātmanaḥ svayamātmāntaryāmī pracodayati|| 69||
अर्थ
आप सबके आत्मा और अन्तर्यामी हैं। जगत्में जितने चराचर प्राणी हैं, सब आपके ही आश्रित हैं। आप ही उनके अचेतन मन, इन्द्रिय और प्राणोंके प्रेरक हैं*॥ ६९॥
य इह वाव स्थिरचरनिकराणां निजनिकेतनानां मनइन्द्रियासुगणाननात्मनः स्वयमात्मान्तर्यामी प्रचोदयति॥ ६९॥
आप सबके आत्मा और अन्तर्यामी हैं। जगत्में जितने चराचर प्राणी हैं, सब आपके ही आश्रित हैं। आप ही उनके अचेतन मन, इन्द्रिय और प्राणोंके प्रेरक हैं॥ ६९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.69 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 941) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/6/69/
टिप्पणियाँ
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६७, ६८, ६९—इन तीनों वाक्योंद्वारा क्रमशः गायत्रीमन्त्रके ‘तत्सवितुर्वरेण्यम्,’ ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ और ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’—इन तीन चरणोंकी व्याख्या करते हुए भगवान् सूर्यकी स्तुति की गयी है।