॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.6.51
तासां स चतुरः शिष्यानुपाहूय महामतिः।
एकैकां संहितां ब्रह्मन्नेकैकस्मै ददौ विभुः॥ ५१
tāsāṃ sa caturaḥ śiṣyānupāhūya mahāmatiḥ|
ekaikāṃ saṃhitāṃ brahmannekaikasmai dadau vibhuḥ|| 51
अर्थ
जैसे मणियोंके समूहमेंसे विभिन्न जातिकी मणियाँ छाँटकर अलग-अलग कर दी जाती हैं, वैसे ही महामति भगवान् व्यासदेवने मन्त्र-समुदायमेंसे भिन्न-भिन्न प्रकरणोंके अनुसार मन्त्रोंका संग्रह करके उनसे ऋग्, यजुः, साम और अथर्व—ये चार संहिताएँ बनायीं और अपने चार शिष्योंको बुलाकर प्रत्येकको एक-एक संहिताकी शिक्षा दी॥ ५०-५१॥