श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.39

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

ततोऽभूत्त्रिवृदोङ्कारो योऽव्यक्तप्रभवः स्वराट्।

यत्तल्लिङ्ग भगवतो ब्रह्मणः परमात्मनः॥ ३९

tato'bhūttrivṛdoṅkāro yo'vyaktaprabhavaḥ svarāṭ|

yattalliṅga bhagavato brahmaṇaḥ paramātmanaḥ|| 39

अर्थ

उसी अनाहत नादसे ‘अ’ कार, ‘उ’ कार और ‘म’ काररूप तीन मात्राओंसे युक्त ॐकार प्रकट हुआ। इस ॐकारकी शक्तिसे ही प्रकृति अव्यक्तसे व्यक्तरूपमें परिणत हो जाती है। ॐकार स्वयं भी अव्यक्त एवं अनादि है और परमात्म-स्वरूप होनेके कारण स्वयंप्रकाश भी है। जिस परम वस्तुको भगवान् ब्रह्म अथवा परमात्माके नामसे कहा जाता है, उसके स्वरूपका बोध भी ॐकारके द्वारा ही होता है॥ ३९॥

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