श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.6.28

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सूत उवाच

इत्युक्तः स तथेत्याह महर्षेर्मानयन् वचः।

सर्पसत्रादुपरतः पूजयामास वाक्पतिम्॥ २८

ityuktaḥ sa tathetyāha maharṣermānayan vacaḥ|

sarpasatrāduparataḥ pūjayāmāsa vākpatim|| 28

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! महर्षि बृहस्पतिजीकी बातका सम्मान करके जनमेजयने कहा कि ‘आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।’ उन्होंने सर्प-सत्र बंद कर दिया और देवगुरु बृहस्पतिजीकी विधिपूर्वक पूजा की॥ २८॥

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