राजन्! जगत्के प्राणी अपने-अपने कर्मके अनुसार ही जीवन, मरण और मरणोत्तर गति प्राप्त करते हैं। कर्मके अतिरिक्त और कोई भी किसीको सुख-दुःख नहीं दे सकता॥ २५॥
जीवितं मरणं जन्तोर्गतिः स्वेनैव कर्मणा।
राजंस्ततोऽन्यो नान्यस्य प्रदाता सुखदुःखयोः॥ २५
राजन्! जगत्के प्राणी अपने-अपने कर्मके अनुसार ही जीवन, मरण और मरणोत्तर गति प्राप्त करते हैं। कर्मके अतिरिक्त और कोई भी किसीको सुख-दुःख नहीं दे सकता॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.6.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 935) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/6/25/