मन ही आत्माके लिये शरीर, विषय और कर्मोंकी कल्पना कर लेता है; और उस मनकी सृष्टि करती है माया (अविद्या)। वास्तवमें माया ही जीवके संसार-चक्रमें पड़नेका कारण है॥ ६॥
मनः सृजति वै देहान् गुणान् कर्माणि चात्मनः।
तन्मनः सृजते माया ततो जीवस्य संसृतिः॥ ६
मन ही आत्माके लिये शरीर, विषय और कर्मोंकी कल्पना कर लेता है; और उस मनकी सृष्टि करती है माया (अविद्या)। वास्तवमें माया ही जीवके संसार-चक्रमें पड़नेका कारण है॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.5.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 931) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/5/6/