॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.5.3
न भविष्यसि भूत्वा त्वं पुत्रपौत्रादिरूपवान्।
बीजांकुरवद् देहादेर्व्यतिरिक्तो यथानलः॥ ३
na bhaviṣyasi bhūtvā tvaṃ putrapautrādirūpavān|
bījāṃkuravad dehādervyatirikto yathānalaḥ|| 3
अर्थ
जैसे बीजसे अंकुर और अंकुरसे बीजकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही एक देहसे दूसरे देहकी और दूसरे देहसे तीसरेकी उत्पत्ति होती है। किन्तु तुम न तो किसीसे उत्पन्न हुए हो और न तो आगे पुत्र-पौत्रादिकोंके शरीरके रूपमें उत्पन्न होओगे। अजी, जैसे आग लकड़ीसे सर्वथा अलग रहती है—लकड़ीकी उत्पत्ति और विनाशसे सर्वथा परे, वैसे ही तुम भी शरीर आदिसे सर्वथा अलग हो॥ ३॥