श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.5.3

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

न भविष्यसि भूत्वा त्वं पुत्रपौत्रादिरूपवान्।

बीजांकुरवद् देहादेर्व्यतिरिक्तो यथानलः॥ ३

na bhaviṣyasi bhūtvā tvaṃ putrapautrādirūpavān|

bījāṃkuravad dehādervyatirikto yathānalaḥ|| 3

अर्थ

जैसे बीजसे अंकुर और अंकुरसे बीजकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही एक देहसे दूसरे देहकी और दूसरे देहसे तीसरेकी उत्पत्ति होती है। किन्तु तुम न तो किसीसे उत्पन्‍न हुए हो और न तो आगे पुत्र-पौत्रादिकोंके शरीरके रूपमें उत्पन्‍न होओगे। अजी, जैसे आग लकड़ीसे सर्वथा अलग रहती है—लकड़ीकी उत्पत्ति और विनाशसे सर्वथा परे, वैसे ही तुम भी शरीर आदिसे सर्वथा अलग हो॥ ३॥

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