॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.4.27
सत्यं ह्यवयवः प्रोक्तः सर्वावयविनामिह।
विनार्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवांग तन्तवः॥ २७
satyaṃ hyavayavaḥ proktaḥ sarvāvayavināmiha|
vinārthena pratīyeran paṭasyevāṃga tantavaḥ|| 27
अर्थ
परीक्षित्! जगत्के व्यवहारमें जितने भी अवयवी पदार्थ होते हैं, उनके न होनेपर भी उनके भिन्न-भिन्न अवयव सत्य माने जाते हैं। क्योंकि वे उनके कारण हैं। जैसे वस्त्ररूप अवयवीके न होनेपर भी उसके कारणरूप सूतका अस्तित्व माना ही जाता है, उसी प्रकार कार्यरूप जगत्के अभावमें भी इस जगत्के कारणरूप अवयवकी स्थिति हो सकती है॥ २७॥