श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.27

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

सत्यं ह्यवयवः प्रोक्तः सर्वावयविनामिह।

विनार्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवांग तन्तवः॥ २७

satyaṃ hyavayavaḥ proktaḥ sarvāvayavināmiha|

vinārthena pratīyeran paṭasyevāṃga tantavaḥ|| 27

अर्थ

परीक्षित्! जगत‍्के व्यवहारमें जितने भी अवयवी पदार्थ होते हैं, उनके न होनेपर भी उनके भिन्‍न-भिन्‍न अवयव सत्य माने जाते हैं। क्योंकि वे उनके कारण हैं। जैसे वस्त्ररूप अवयवीके न होनेपर भी उसके कारणरूप सूतका अस्तित्व माना ही जाता है, उसी प्रकार कार्यरूप जगत‍्के अभावमें भी इस जगत‍्के कारणरूप अवयवकी स्थिति हो सकती है॥ २७॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें