श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.4.21

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

न स्वप्नजाग्रन्‍न च तत् सुषुप्तं

न खं जलं भूरनिलोऽग्‍निरर्कः।

संसुप्तवच्छून्यवदप्रतर्क्यं

तन्मूलभूतं पदमामनन्ति॥ २१

na svapnajāgranna ca tat suṣuptaṃ

na khaṃ jalaṃ bhūranilo'gnirarkaḥ|

saṃsuptavacchūnyavadapratarkyaṃ

tanmūlabhūtaṃ padamāmananti|| 21

अर्थ

उस समय स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति—ये तीन अवस्थाएँ नहीं रहतीं। आकाश, जल, पृथ्वी, वायु, अग्‍नि और सूर्य भी नहीं रहते। सब कुछ सोये हुएके समान शून्य-सा रहता है। उस अवस्थाका तर्कके द्वारा अनुमान करना भी असम्भव है। उस अव्यक्तको ही जगत‍्का मूलभूत तत्त्व कहते हैं॥ २१॥

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