श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.44

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

यन्‍नामधेयं म्रियमाण आतुरः

पतन् स्खलन् वा विवशो गृणन् पुमान्।

विमुक्तकर्मार्गल उत्तमां गतिं

प्राप्नोति यक्ष्यन्ति न तं कलौ जनाः॥ ४४

yannāmadheyaṃ mriyamāṇa āturaḥ

patan skhalan vā vivaśo gṛṇan pumān|

vimuktakarmārgala uttamāṃ gatiṃ

prāpnoti yakṣyanti na taṃ kalau janāḥ|| 44

अर्थ

मनुष्य मरनेके समय आतुरताकी स्थितिमें अथवा गिरते या फिसलते समय विवश होकर भी यदि भगवान्‌के किसी एक नामका उच्चारण कर ले, तो उसके सारे कर्मबन्धन छिन्‍न-भिन्‍न हो जाते हैं और उसे उत्तम-से-उत्तम गति प्राप्त होती है। परन्तु हाय रे कलियुग! कलियुगसे प्रभावित होकर लोग उन भगवान्‌की आराधनासे भी विमुख हो जाते हैं॥ ४४॥

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