श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.4

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

एवं क्रमेण जेष्यामः पृथ्वीं सागरमेखलाम्।

इत्याशाबद्धहृदया न पश्यन्त्यन्तिकेऽन्तकम्॥ ४

evaṃ krameṇa jeṣyāmaḥ pṛthvīṃ sāgaramekhalām|

ityāśābaddhahṛdayā na paśyantyantike'ntakam|| 4

अर्थ

इस प्रकार धीरे-धीरे क्रमसे सारी पृथ्वी हमारे अधीन हो जायगी और फिर तो समुद्र ही हमारे राज्यकी खाईंका काम करेगा।’ इस प्रकार वे अपने मनमें अनेकों आशाएँ बाँध लेते हैं और उन्हें यह बात बिलकुल नहीं सूझती कि उनके सिरपर काल सवार है॥ ४॥

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