श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.3.18

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

कृते प्रवर्तते धर्मश्‍चतुष्पात्तज्जनैर्धृतः१।

सत्यं दया तपो दानमिति पादा विभोर्नृप॥ १८

kṛte pravartate dharmaścatuṣpāttajjanairdhṛtaḥ|

satyaṃ dayā tapo dānamiti pādā vibhornṛpa|| 18

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! सत्ययुगमें धर्मके चार चरण होते हैं; वे चरण हैं—सत्य, दया, तप और दान। उस समयके लोग पूरी निष्ठाके साथ अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं। धर्म स्वयं भगवान्‌का स्वरूप है॥ १८॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    ष्यादो जनै०।

    (मुद्रित पृष्ठ 919)

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