क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव सन्तप्स्यन्ते च चिन्तया।
त्रिंशद्विंशतिवर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम्॥ ११
kṣuttṛḍbhyāṃ vyādhibhiścaiva santapsyante ca cintayā|
triṃśadviṃśativarṣāṇi paramāyuḥ kalau nṛṇām|| 11
अर्थ
लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे दुःखी रहेंगे। रोगोंसे तो उन्हें छुटकारा ही न मिलेगा। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु केवल बीस या तीस वर्षकी होगी॥ ११॥
क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव सन्तप्स्यन्ते च चिन्तया।
त्रिंशद्विंशतिवर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम्॥ ११
लोग भूख-प्यास तथा नाना प्रकारकी चिन्ताओंसे दुःखी रहेंगे। रोगोंसे तो उन्हें छुटकारा ही न मिलेगा। कलियुगमें मनुष्योंकी परमायु केवल बीस या तीस वर्षकी होगी॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.2.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 912) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/2/11/