॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.12.68
स्वसुखनिभृतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो-
ऽप्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम्।
व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणं
तमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोऽस्मि॥ ६८
svasukhanibhṛtacetāstadvyudastānyabhāvo-
'pyajitaruciralīlākṛṣṭasārastadīyam|
vyatanuta kṛpayā yastattvadīpaṃ purāṇaṃ
tamakhilavṛjinaghnaṃ vyāsasūnuṃ nato'smi|| 68
अर्थ
श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्न थे। इस अखण्ड अद्वैत स्थितिसे उनकी भेददृष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी। फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी मधुमयी, मंगलमयी, मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगत्के प्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वको प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया। मैं उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजीके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ॥ ६८॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां द्वादशस्कन्धे
द्वादशस्कन्धार्थनिरूपणं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥