श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.12.15

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

नारदस्य च संवादस्ततः प्रैयव्रतं द्विजाः।

नाभेस्ततोऽनुचरितमृषभस्य भरतस्य च॥ १५

nāradasya ca saṃvādastataḥ praiyavrataṃ dvijāḥ|

nābhestato'nucaritamṛṣabhasya bharatasya ca|| 15

अर्थ

चौथे स्कन्धमें मरीचि आदि नौ प्रजापतियोंकी उत्पत्ति, दक्षयज्ञका विध्वंस, राजर्षि ध्रुव एवं पृथुका चरित्र तथा प्राचीनबर्हि और नारदजीके संवादका वर्णन है। पाँचवें स्कन्धमें प्रियव्रतका उपाख्यान; नाभि, ऋषभ और भरतके चरित्र, द्वीप, वर्ष, समुद्र, पर्वत और नदियोंका वर्णन; ज्योतिश्‍चक्रके विस्तार एवं पाताल तथा नरकोंकी स्थितिका निरूपण हुआ है॥ १४—१६॥

यह अर्थ श्लोक 14–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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