श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.12.11

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ऊर्ध्वतिर्यगवाक्सर्गो रुद्रसर्गस्तथैव च।

अर्धनारीनरस्याथ यतः स्वायम्भुवो मनुः॥ ११

ūrdhvatiryagavāksargo rudrasargastathaiva ca|

ardhanārīnarasyātha yataḥ svāyambhuvo manuḥ|| 11

अर्थ

तदनन्तर स्थूल और सूक्ष्म कालका स्वरूप, लोक-पद्मकी उत्पत्ति, प्रलय-समुद्रसे पृथ्वीका उद्धार करते समय वराहभगवान्‌के द्वारा हिरण्याक्षका वध; देवता, पशु, पक्षी और मनुष्योंकी सृष्टि एवं रुद्रोंकी उत्पत्तिका प्रसंग है। इसके पश्‍चात् उस अर्द्धनारी-नरके स्वरूपका विवेचन है, जिससे स्वायम्भुव मनु और स्त्रियोंकी अत्यन्त उत्तम आद्या प्रकृति शतरूपाका जन्म हुआ था। कर्दम प्रजापतिका चरित्र, उनसे मुनिपत्‍नियोंका जन्म, महात्मा भगवान् कपिलका अवतार और फिर कपिलदेव तथा उनकी माता देवहूतिके संवादका प्रसंग आता है॥ १०—१३॥

यह अर्थ श्लोक 10–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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