एवं ह्यनादिनिधनो भगवान् हरिरीश्वरः।
कल्पे कल्पे स्वमात्मानं व्यूह्य लोकानवत्यजः॥ ५०
इस प्रकार अनादि, अनन्त, अजन्मा भगवान् श्रीहरि ही कल्प-कल्पमें अपने स्वरूपका विभाग करके लोकोंका पालन-पोषण करते-रहते हैं॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.11.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 969) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/11/50/