श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.10.41

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

एतत् केचिदविद्वांसो मायासंसृतिमात्मनः।

अनाद्यावर्तितं नॄणां कादाचित्कं प्रचक्षते॥ ४१

etat kecidavidvāṃso māyāsaṃsṛtimātmanaḥ|

anādyāvartitaṃ nṝṇāṃ kādācitkaṃ pracakṣate|| 41

अर्थ

शौनकजी! यह जो मार्कण्डेयजीने अनेक कल्पोंका—सृष्टि-प्रलयोंका अनुभव किया, वह भगवान्‌की मायाका ही वैभव था, तात्कालिक था और उन्हींके लिये था, सर्वसाधारणके लिये नहीं। कोई-कोई इस मायाकी रचनाको न जानकर अनादिकालसे बार-बार होनेवाले सृष्टि-प्रलय ही इसको भी बतलाते हैं। (इसलिये आपको यह शंका नहीं करनी चाहिये कि इसी कल्पके हमारे पूर्वज मार्कण्डेयजीकी आयु इतनी लम्बी कैसे हो गयी?)॥ ४१॥✎ 1785

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1785 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनादि-कालसे → अनादिकालसे

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