सूतजी कहते हैं—मार्कण्डेयजी इस प्रकार शरणागतिकी भावनामें तन्मय हो रहे थे। उसी समय भगवान् शंकर भगवती पार्वतीजीके साथ नन्दीपर सवार होकर आकाशमार्गसे विचरण करते हुए उधर आ निकले और मार्कण्डेयजीको उसी अवस्थामें देखा। उनके साथ बहुत-से गण भी थे॥ ३॥
तमेवं निभृतात्मानं वृषेण दिवि पर्यटन्।
रुद्राण्या भगवान् रुद्रो ददर्श स्वगणैर्वृतः॥ ३
सूतजी कहते हैं—मार्कण्डेयजी इस प्रकार शरणागतिकी भावनामें तन्मय हो रहे थे। उसी समय भगवान् शंकर भगवती पार्वतीजीके साथ नन्दीपर सवार होकर आकाशमार्गसे विचरण करते हुए उधर आ निकले और मार्कण्डेयजीको उसी अवस्थामें देखा। उनके साथ बहुत-से गण भी थे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.10.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 959) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/10/3/