॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.10.22
न ते मय्यच्युतेऽजे च भिदामण्वपि चक्षते।
नात्मनश्च जनस्यापि तद् युष्मान् वयमीमहि॥ २२
na te mayyacyute'je ca bhidāmaṇvapi cakṣate|
nātmanaśca janasyāpi tad yuṣmān vayamīmahi|| 22
अर्थ
ऐसे शान्त महापुरुष मुझमें, विष्णुभगवान्में, ब्रह्मामें, अपनेमें और सब जीवोंमें अणुमात्र भी भेद नहीं देखते। सदा-सर्वदा, सर्वत्र और सर्वथा एकरस आत्माका ही दर्शन करते हैं। इसलिये हम तुम्हारे-जैसे महात्माओंकी स्तुति और सेवा करते हैं॥ २२॥