श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.1.3

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

प्रद्योतसंज्ञं राजानं कर्ता यत् पालकः सुतः।

विशाखयूपस्तत्पुत्रो भविता राजकस्ततः॥ ३

pradyotasaṃjñaṃ rājānaṃ kartā yat pālakaḥ sutaḥ|

viśākhayūpastatputro bhavitā rājakastataḥ|| 3

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—प्रिय परीक्षित्! मैंने तुम्हें नवें स्कन्धमें यह बात बतलायी थी कि जरासन्धके पिता बृहद्रथके वंशमें अन्तिम राजा होगा पुरंजय अथवा रिपुंजय। उसके मन्त्रीका नाम होगा शुनक। वह अपने स्वामीको मार डालेगा और अपने पुत्र प्रद्योतको राजसिंहासनपर अभिषिक्त करेगा। प्रद्योतका पुत्र होगा पालक, पालकका विशाखयूप, विशाखयूपका राजक और राजकका पुत्र होगा नन्दिवर्द्धन। प्रद्योतवंशमें यही पाँच नरपति होंगे। इनकी संज्ञा होगी ‘प्रद्योतन’। ये एक सौ अड़तीस वर्षतक पृथ्वीका उपभोग करेंगे॥ २—४॥✎ 1779

यह अर्थ श्लोक 2–4 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1779 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नन्दि-वर्द्धन। → नन्दिवर्द्धन।

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