श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.9.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

द्वावेव चिन्तया मुक्तौ परमानन्द आप्लुतौ।

यो विमुग्धो जडो बालो यो गुणेभ्यः परं गतः॥ ४

dvāveva cintayā muktau paramānanda āplutau|

yo vimugdho jaḍo bālo yo guṇebhyaḥ paraṃ gataḥ|| 4

अर्थ

इस जगत‍्में दो ही प्रकारके व्यक्ति निश्‍चिन्त और परमानन्दमें म‌ग्‍न रहते हैं—एक तो भोलाभाला निश्‍चेष्ट नन्हा-सा बालक और दूसरा वह पुरुष जो गुणातीत हो गया हो॥ ४॥

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