आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।
यथा सञ्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिंगला॥ ४४
सचमुच आशा ही सबसे बड़ा दुःख है और निराशा ही सबसे बड़ा सुख है; क्योंकि पिंगला वेश्याने जब पुरुषकी आशा त्याग दी, तभी वह सुखसे सो सकी॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.8.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 769) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/44/