अब मैं भगवान्का यह उपकार आदरपूर्वक सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ और विषयभोगोंकी दुराशा छोड़कर उन्हीं जगदीश्वरकी शरण ग्रहण करती हूँ॥ ३९॥✎ 1740
तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसंगताः।
त्यक्त्वा दुराशाः शरणं व्रजामि तमधीश्वरम्॥ ३९
अब मैं भगवान्का यह उपकार आदरपूर्वक सिर झुकाकर स्वीकार करती हूँ और विषयभोगोंकी दुराशा छोड़कर उन्हीं जगदीश्वरकी शरण ग्रहण करती हूँ॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.8.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 768) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/8/39/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)