श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तस्या निर्विण्णचित्ताया गीतं शृणु यथा मम।

निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा ह्यसिः॥ २८

tasyā nirviṇṇacittāyā gītaṃ śṛṇu yathā mama|

nirveda āśāpāśānāṃ puruṣasya yathā hyasiḥ|| 28

अर्थ

जब पिंगलाके चित्तमें इस प्रकार वैराग्यकी भावना जाग्रत् हुई, तब उसने एक गीत गाया। वह मैं तुम्हें सुनाता हूँ। राजन्! मनुष्य आशाकी फाँसीपर लटक रहा है। इसको तलवारकी तरह काटनेवाली यदि कोई वस्तु है तो वह केवल वैराग्य है॥ २८॥

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