श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.8.26

एकादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती।

निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत॥ २६

evaṃ durāśayā dhvastanidrā dvāryavalambatī|

nirgacchantī praviśatī niśīthaṃ samapadyata|| 26

अर्थ

उसके चित्तकी यह दुराशा बढ़ती ही जाती थी। वह दरवाजेपर बहुत देरतक टँगी रही। उसकी नींद भी जाती रही। वह कभी बाहर आती तो कभी भीतर जाती। इस प्रकार आधी रात हो गयी॥ २६॥

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