॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.7.8
पुंसोऽयुक्तस्य नानार्थो भ्रमः स गुणदोषभाक्।
कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा॥ ८
puṃso'yuktasya nānārtho bhramaḥ sa guṇadoṣabhāk|
karmākarmavikarmeti guṇadoṣadhiyo bhidā|| 8
अर्थ
जिस पुरुषका मन अशान्त है, असंयत है, उसीको पागलकी तरह अनेकों वस्तुएँ मालूम पड़ती हैं; वास्तवमें यह चित्तका भ्रम ही है। नानात्वका भ्रम हो जानेपर ही ‘यह गुण है’ और ‘यह दोष’ इस प्रकारकी कल्पना करनी पड़ती है । जिसकी बुद्धिमें गुण और दोषका भेद बैठ गया है, दृढ़मूल हो गया है, उसीके लिये कर्म*, अकर्म† और विकर्मरूप‡ भेदका प्रतिपादन हुआ है॥ ८॥
टिप्पणियाँ
- *
विहित कर्म।
- †
विहित कर्मका लोप।
- ‡
निषिद्ध कर्म।