श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.68

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अहो मे पश्यतापायमल्पपुण्यस्य दुर्मतेः।

अतृप्तस्याकृतार्थस्य गृहस्त्रैवर्गिको हतः॥ ६८

aho me paśyatāpāyamalpapuṇyasya durmateḥ|

atṛptasyākṛtārthasya gṛhastraivargiko hataḥ|| 68

अर्थ

‘मैं अभागा हूँ, दुर्मति हूँ। हाय, हाय! मेरा तो सत्यानाश हो गया। देखो, देखो, न मुझे अभी तृप्ति हुई और न मेरी आशाएँ ही पूरी हुईं। तबतक मेरा धर्म, अर्थ और कामका मूल यह गृहस्थाश्रम ही नष्ट हो गया॥ ६८॥

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