राजन्! कबूतरीपर कबूतरका इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती, कबूतर बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना पूर्ण करता; वह कबूतरी भी अपने कामुक पतिकी कामनाएँ पूर्ण करती॥ ५६॥✎ 1820
यं यं वाञ्छति सा राजंस्तर्पयन्त्यनुकम्पिता।
तं तं समनयत् कामं कृच्छ्रेणाप्यजितेन्द्रियः॥ ५६
राजन्! कबूतरीपर कबूतरका इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती, कबूतर बड़े-से-बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना पूर्ण करता; वह कबूतरी भी अपने कामुक पतिकी कामनाएँ पूर्ण करती॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 760) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/56/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1820 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): बच्चे → हाथ-पैरवाले बच्चे