उस कबूतरके जोड़ेके हृदयमें निरन्तर एक-दूसरेके प्रति स्नेहकी वृद्धि होती जाती थी। वे गृहस्थधर्ममें इतने आसक्त हो गये थे कि उन्होंने एक-दूसरेकी दृष्टि-से-दृष्टि, अंग-से-अंग और बुद्धिसे-बुद्धिको बाँध रखा था॥ ५४॥✎ 17392146
कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।
दृष्टिं दृष्ट्यांगमंगेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतुः॥ ५४
उस कबूतरके जोड़ेके हृदयमें निरन्तर एक-दूसरेके प्रति स्नेहकी वृद्धि होती जाती थी। वे गृहस्थधर्ममें इतने आसक्त हो गये थे कि उन्होंने एक-दूसरेकी दृष्टि-से-दृष्टि, अंग-से-अंग और बुद्धिसे-बुद्धिको बाँध रखा था॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.7.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 760) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/7/54/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)