श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.54

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

कपोतौ स्नेहगुणितहृदयौ गृहधर्मिणौ।

दृष्टिं दृष्ट्यांगमंगेन बुद्धिं बुद्ध्या बबन्धतुः॥ ५४

kapotau snehaguṇitahṛdayau gṛhadharmiṇau|

dṛṣṭiṃ dṛṣṭyāṃgamaṃgena buddhiṃ buddhyā babandhatuḥ|| 54

अर्थ

उस कबूतरके जोड़ेके हृदयमें निरन्तर एक-दूसरेके प्रति स्नेहकी वृद्धि होती जाती थी। वे गृहस्थधर्ममें इतने आसक्त हो गये थे कि उन्होंने एक-दूसरेकी दृष्टि-से-दृष्टि, अंग-से-अंग और बुद्धिसे-बुद्धिको बाँध रखा था॥ ५४॥✎ 1739 2146

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1739 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बुद्धि-से-बुद्धिको → बुद्धिसे-बुद्धिको
  • #2146 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): तन्त्रॺ खोक → तन्त्र्य खोक

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