श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.44

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

स्वच्छः प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूर्नृणाम्।

मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनैः॥ ४४

svacchaḥ prakṛtitaḥ snigdho mādhuryastīrthabhūrnṛṇām|

muniḥ punātyapāṃ mitramīkṣopasparśakīrtanaiḥ|| 44

अर्थ

जिस प्रकार जल स्वभावसे ही स्वच्छ, चिकना, मधुर और पवित्र करनेवाला होता है तथा गंगा आदि तीर्थोंके दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारणसे भी लोग पवित्र हो जाते हैं—वैसे ही साधकको भी स्वभावसे ही शुद्ध, स्निग्ध, मधुरभाषी और लोकपावन होना चाहिये। जलसे शिक्षा ग्रहण करनेवाला अपने दर्शन, स्पर्श और नामोच्चारणसे लोगोंको पवित्र कर देता है॥ ४४॥

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