श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.7.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

सोऽहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढ-

स्त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे।

तत्त्वञ्जसा निगदितं भवता यथाहं

संसाधयामि भगवन्‍ननुशाधि भृत्यम्॥ १६

so'haṃ mamāhamiti mūḍhamatirvigāḍha-

stvanmāyayā viracitātmani sānubandhe|

tattvañjasā nigaditaṃ bhavatā yathāhaṃ

saṃsādhayāmi bhagavannanuśādhi bhṛtyam|| 16

अर्थ

प्रभो! मैं भी ऐसा ही हूँ; मेरी मति इतनी मूढ़ हो गयी है कि ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है’ इस भावसे मैं आपकी मायाके खेल, देह और देहके सम्बन्धी स्त्री, पुत्र, धन आदिमें डूब रहा हूँ। अतः भगवन्! आपने जिस संन्यासका उपदेश किया है, उसका तत्त्व मुझ सेवकको इस प्रकार समझाइये कि मैं सुगमतापूर्वक उसका साधन कर सकूँ॥ १६॥

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