श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.50

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं विज्ञापितो राजन् भगवान् देवकीसुतः।

एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत॥ ५०

evaṃ vijñāpito rājan bhagavān devakīsutaḥ|

ekāntinaṃ priyaṃ bhṛtyamuddhavaṃ samabhāṣata|| 50

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब उद्धवजीने देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने अपने अनन्यप्रेमी सखा एवं सेवक उद्धवजीसे कहा॥ ५०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें