श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब उद्धवजीने देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने अपने अनन्यप्रेमी सखा एवं सेवक उद्धवजीसे कहा॥ ५०॥
एवं विज्ञापितो राजन् भगवान् देवकीसुतः।
एकान्तिनं प्रियं भृत्यमुद्धवं समभाषत॥ ५०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब उद्धवजीने देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने अपने अनन्यप्रेमी सखा एवं सेवक उद्धवजीसे कहा॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.6.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 751) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/6/50/