श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.6.41

एकादश स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

विविक्त उपसंगम्य जगतामीश्‍वरेश्‍वरम्।

प्रणम्य शिरसा पादौ प्रांजलिस्तमभाषत॥ ४१

vivikta upasaṃgamya jagatāmīśvareśvaram|

praṇamya śirasā pādau prāṃjalistamabhāṣata|| 41

अर्थ

परीक्षित्! उद्धवजी भगवान् श्रीकृष्णके बड़े प्रेमी और सेवक थे। उन्होंने जब यदुवंशियोंको यात्राकी तैयारी करते देखा, भगवान्‌की आज्ञा सुनी और अत्यन्त घोर अपशकुन देखे तब वे जगत‍्के एकमात्र अधिपति भगवान् श्रीकृष्णके पास एकान्तमें गये, उनके चरणोंपर अपना सिर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करने लगे॥ ४०-४१॥

यह अर्थ श्लोक 40–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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