dharmaśca sthāpitaḥ satsu satyasandheṣu vai tvayā|
kīrtiśca dikṣu vikṣiptā sarvalokamalāpahā|| 22
अर्थ
आपने सत्यपरायण साधुपुरुषोंके कल्याणार्थ धर्मकी स्थापना भी कर दी और दसों दिशाओंमें ऐसी कीर्ति फैला दी, जिसे सुन-सुनाकर सब लोग अपने मनका मैल मिटा देते हैं॥ २२॥
धर्मश्च स्थापितः सत्सु सत्यसन्धेषु वै त्वया।
कीर्तिश्च दिक्षु विक्षिप्ता सर्वलोकमलापहा॥ २२
आपने सत्यपरायण साधुपुरुषोंके कल्याणार्थ धर्मकी स्थापना भी कर दी और दसों दिशाओंमें ऐसी कीर्ति फैला दी, जिसे सुन-सुनाकर सब लोग अपने मनका मैल मिटा देते हैं॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.6.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 748) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/6/22/