इतिहासमिमं पुण्यं धारयेद् यः समाहितः।
स विधूयेह शमलं ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ५२
राजन्! यह इतिहास परम पवित्र है। जो एकाग्रचित्तसे इसे धारण करता है, वह अपना सारा शोक-मोह दूर करके ब्रह्मपदको प्राप्त होता है॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.5.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 744) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/5/52/