श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.40

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी।

ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्‍वर।

प्रायो भक्ता भगवति वासुदेवेऽमलाशयाः॥ ४०

kāverī ca mahāpuṇyā pratīcī ca mahānadī|

ye pibanti jalaṃ tāsāṃ manujā manujeśvara|

prāyo bhaktā bhagavati vāsudeve'malāśayāḥ|| 40

अर्थ

राजन्! सत्ययुग, त्रेता और द्वापरकी प्रजा चाहती है कि हमारा जन्म कलियुगमें हो; क्योंकि कलियुगमें कहीं-कहीं भगवान् नारायणके शरणागत उन्हींके आश्रयमें रहनेवाले बहुत-से भक्त उत्पन्‍न होंगे। महाराज विदेह! कलियुगमें द्रविड़देशमें अधिक भक्त पाये जाते हैं; जहाँ ताम्रपर्णी, कृतमाला, पयस्विनी, परम पवित्र कावेरी, महानदी और प्रतीची नामकी नदियाँ बहती हैं। राजन्! जो मनुष्य इन नदियोंका जल पीते हैं, प्रायः उनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और वे भगवान् वासुदेवके भक्त हो जाते हैं॥ ३८—४०॥✎ 1736

यह अर्थ श्लोक 38–40 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1736 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कलि-युगमें → कलियुगमें

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