श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.35

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

एवं युगानुरूपाभ्यां भगवान् युगवर्तिभिः।

मनुजैरिज्यते राजन् श्रेयसामीश्‍वरो हरिः॥ ३५

evaṃ yugānurūpābhyāṃ bhagavān yugavartibhiḥ|

manujairijyate rājan śreyasāmīśvaro hariḥ|| 35

अर्थ

राजन्! इस प्रकार विभिन्‍न युगोंके लोग अपने-अपने युगके अनुरूप नाम-रूपोंद्वारा विभिन्‍न प्रकारसे भगवान्‌की आराधना करते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—सभी पुरुषार्थोंके एकमात्र स्वामी भगवान् श्रीहरि ही हैं॥ ३५॥✎ 1736

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1736 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: कलि-युगमें → कलियुगमें

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