श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.5.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

सर्वेषु शश्‍वत्तनुभृत्स्ववस्थितं

यथा खमात्मानमभीष्टमीश्‍वरम्।

वेदोपगीतं च न शृण्वतेऽबुधा

मनोरथानां प्रवदन्ति वार्तया॥ १०

sarveṣu śaśvattanubhṛtsvavasthitaṃ

yathā khamātmānamabhīṣṭamīśvaram|

vedopagītaṃ ca na śṛṇvate'budhā

manorathānāṃ pravadanti vārtayā|| 10

अर्थ

राजन्! वेदोंने इस बातको बार-बार दुहराया है कि भगवान् आकाशके समान नित्य-निरन्तर समस्त शरीरधारियोंमें स्थित हैं। वे ही अपने आत्मा और प्रियतम हैं। परन्तु वे मूर्ख इस वेदवाणीको तो सुनते ही नहीं और केवल बड़े-बड़े मनोरथोंकी बात आपसमें कहते-सुनते रहते हैं॥ १०॥✎ 1730 1731 1911

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1730 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: परम-तत्त्वका → परमतत्त्वका
  • #1731 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वेदा-ध्ययनसे → वेदाध्ययनसे
  • #1911 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): प्रवृति → प्रवृत्ति

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