श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भूतैर्यदा पंचभिरात्मसृष्टैः

पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन्।

स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधान-

मवाप नारायण आदिदेवः॥ ३

bhūtairyadā paṃcabhirātmasṛṣṭaiḥ

puraṃ virājaṃ viracayya tasmin|

svāṃśena viṣṭaḥ puruṣābhidhāna-

mavāpa nārāyaṇa ādidevaḥ|| 3

अर्थ

भगवान्‌ने ही पृथ्वी, जल, अग्‍नि, वायु, आकाश—इन पाँच भूतोंकी अपने-आपसे अपने-आपमें सृष्टि की है। जब वे इनके द्वारा विराट् शरीर, ब्रह्माण्डका निर्माण करके उसमें लीलासे अपने अंश अन्तर्यामीरूपसे प्रवेश करते हैं, (भोक्तारूपसे नहीं, क्योंकि भोक्ता तो अपने पुण्योंके फलस्वरूप जीव ही होता है) तब उन आदिदेव नारायणको ‘पुरुष’ नामसे कहते हैं, यही उनका पहला अवतार है॥ ३॥

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