श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.4.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तानाह देवदेवेशः प्रणतान् प्रहसन्‍निव।

आसामेकतमां वृङ्ध्वं सवर्णां स्वर्गभूषणाम्॥ १४

tānāha devadeveśaḥ praṇatān prahasanniva|

āsāmekatamāṃ vṛṅdhvaṃ savarṇāṃ svargabhūṣaṇām|| 14

अर्थ

अब उनका सिर झुक गया। देवदेवेश भगवान् नारायण हँसते हुए-से उनसे बोले—‘तुमलोग इनमेंसे किसी एक स्त्रीको, जो तुम्हारे अनुरूप हो, ग्रहण कर लो। वह तुम्हारे स्वर्गलोककी शोभा बढ़ानेवाली होगी॥ १४॥✎ 1728

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1728 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: स्वर्ग-लोककी → स्वर्गलोककी

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