श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.31.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

कथयामास निधनं वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप।

तच्छ्रुत्वोद्वि‌ग्‍नहृदया जनाः शोकविमूर्च्छिताः॥ १६

kathayāmāsa nidhanaṃ vṛṣṇīnāṃ kṛtsnaśo nṛpa|

tacchrutvodvignahṛdayā janāḥ śokavimūrcchitāḥ|| 16

अर्थ

परीक्षित्! उसने अपनेको सँभालकर यदुवंशियोंके विनाशका पूरा-पूरा विवरण कह सुनाया। उसे सुनकर लोग बहुत ही दुःखी हुए और मारे शोकके मूर्च्छित हो गये॥ १६॥✎ 1776 1777

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1776 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भगव-द्विरहसे → भगवद्विरहसे
  • #1777 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सँभाल-कर → सँभालकर

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