ब्रह्माजी और भगवान् शंकर आदि देवता भगवान्की यह परमयोगमयी गति देखकर बड़े विस्मयके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने-अपने लोकमें चले गये॥ १०॥
ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ट्वा योगगतिं हरेः।
विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्वं स्वं लोकं ययुस्तदा॥ १०
ब्रह्माजी और भगवान् शंकर आदि देवता भगवान्की यह परमयोगमयी गति देखकर बड़े विस्मयके साथ उसकी प्रशंसा करते अपने-अपने लोकमें चले गये॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.31.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 904) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/31/10/