इत्युक्तस्तं परिक्रम्य नमस्कृत्य पुनः पुनः।
तत्पादौ शीर्ष्ण्युपाधाय दुर्मनाः प्रययौ पुरीम्॥ ५०
भगवान्का यह आदेश पाकर दारुकने उनकी परिक्रमा की और उनके चरणकमल अपने सिरपर रखकर बारम्बार प्रणाम किया। तदनन्तर वह उदास मनसे द्वारकाके लिये चल पड़ा॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.30.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 903) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/30/50/