श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.30.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

एते घोरा महोत्पाता द्वार्वत्यां यमकेतवः।

मुहूर्त्तमपि न स्थेयमत्र नो यदुपुंगवाः॥ ५

ete ghorā mahotpātā dvārvatyāṃ yamaketavaḥ|

muhūrttamapi na stheyamatra no yadupuṃgavāḥ|| 5

अर्थ

‘श्रेष्ठ यदुवंशियो! यह देखो, द्वारकामें बड़े-बड़े भयंकर उत्पात होने लगे हैं। ये साक्षात् यमराजकी ध्वजाके समान हमारे महान् अनिष्टके सूचक हैं। अब हमें यहाँ घड़ी-दो-घड़ी भी नहीं ठहरना चाहिये॥ ५॥

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